Thursday, July 26, 2012

गजल : खाली पैसों के बदौलत ही ब्यवहार नहीं चलता.

























एक दो बार सही हर बार इनकार नहीं चलता.
इस कमर तोड़ महंगाई में उधार नहीं चलता.

माना की बहूत फ़िक्र है तुझे, अपनों के वास्ते,
पर महज फ़िक्र से ही,घर-परिवार नहीं चलता.

कभी धुप,कभी छाव,कभी बदली,कभी बारिश,
सदा एक जैसा मौसम का किरदार नहीं चलता.

अब छोड़ दे इरादा तू कातिल बनने का ज़माने में,
दिल में दया हो तो हाथो से तलवार नही चलता.

हरदम मत तौलो रिश्तों को दौलत की तराजू में,
खाली पैसों के बदौलत ही ब्यवहार नहीं चलता.

"नूरैन" सब कुछ पूछ मत ये पूछ,हाले-बिजिनस मेरी,
अन्धो के शहर में आईने का कारोबार नहीं चलता.

Wednesday, July 18, 2012

कविता : दुनिया को कहकर अलविदा,रुखसत हो गये काका.














आज सबकी आँखे नम हुई,गमगीन हुआ ठहाका.
अपने सारे चाहने वालों को देकर जोर का धक्का.
                दुनिया को कहकर अलविदा,रुखसत हो गये काका.
अब नहीं रहे हमारे बिच,हमारे पहले सुपर-स्टार.
पर अमर रहेगा ह्रदय में, उनका सदा किरदार. 
                 सदा बहार नगमे उनकी याद सदा दिलाएगी.
                 चाह कर भी ये दुनिया,उनको न भूल पायेगी.
कभी न टूट पायेगा, उनका जग से रिश्ता पक्का.
दुनिया को कहकर अलविदा,रुखसत हो गये काका.
                  सच्चा-झूठा, दो रास्ते, आराधना हो या आनंद.
                  उनकी सारी फिल्मे,पब्लिक को है बहूत पसंद.
बहूत मिस करेंगे उनको,उनके दीवाने सारे. 
अब बन के तारे चमकेंगे बाबु मोसाय हमारे.
                फीका उनके बिन हो जायेगा,पूरा फ़िल्मी इलाका.
                दुनिया को कहकर अलविदा,रुखसत हो गये काका.  

Sunday, July 15, 2012

ग़ज़ल : गर निभाओ तो रिश्ते कभी मरते नहीं है


ग़ज़ल : समा जाते है लोग दिल में ऐतबार बनकर.


समा जाते है लोग दिल में ऐतबार बनकर.
फिर लूट लेते है ख़ज़ाना पहरेदार बनकर,

यकीं करता है इन्सान जिनपे हद से ज्यादा,
डुबों देते है वो ही कश्ती मझदार बनकर,

रिश्तों की अहमियत खूब समझती है दुनिया,
पर लालच आ जाती है बिच में दिवार बनकर.

दौरे-मुश्किल में वसूलों पे चलते है बहूत लोग,
पर भूला देते है वसूलों को मालदार बनकर.

झूठ बिक जाती है पलभर में हजारों के बिच,
सच रह जाता है तन्हा गुनाहगार बनकर,

इंसानियत हो गयी हैं गूंगी,मजहब के नारों से,
लोग,खुदा को बाटते है,धर्म का ठेकेदार बनकर,

ग़ज़ल : जहा भी रहना नाम वफ़ा का, जिंदाबाद रखना तुम.



भले ही अपनी नज़रों में,औरों के बाद रखना तुम.
भूल जाना मेरी हस्ती को, मत याद रखना तुम.

बस एक इल्तिजा है मेरी,तुम से रुखसत होते-होते,
होंठों पे मुस्कराहट की दौलत,आबाद रखना तुम.

हम तो किस्मत के मारे है,आज यहाँ और कल कहा,
बस मुहब्बत ना मिटे दिल से,येही फ़रियाद रखना तुम.

हर एक उम्मीद इंसान की, कभी होती कहा  है  पूरी,
बिछड़ के फिर कभी ना मिलने का,मुराद रखना तुम.

माना की बहूत दर्द  दिया  है, हमको दुनिया वालों ने,
पर आँखे नम ना करना दिल को सदा,फौलाद रखना तुम.
 
कल का हाल तो कल जाने,पर आज ये मेरी ख्वाहिस है,
जहा भी रहना नाम वफ़ा का, जिंदाबाद रखना तुम.

Tuesday, July 3, 2012

कविता :लगता है दिल्ली वालों से रूठ गया मानसून.

इंतजार करते करते बीत गया पूरा जून.
पर थोडा भी नहीं कम हुआ उमस का जूनून.
                   लगता है दिल्ली वालों से रूठ गया मानसून.
निष्ठुर गर्मी कर रही है, जन-जन से उगाही.
हर घर-मोहल्ले,गली-गली में मची है तबाही.
             क्षणिक AC,कूलर,कितना करे जन-मानस की सेवा.
             बाहर निकलों तो देखों,क्या  मौसम  है जानलेवा..
                         खूब सज-संवर रही है दिन में धुप की रानी.
                         अमृत जैसा लगता है, आजकल ठंडा पानी.
ना घर में मिले चैन, ना बाहर है सुकून,
                         लगता है दिल्ली वालों से रूठ गया मानसून.
वन-जंगलों के हिस्से आज बिल्डिंगो ने घेर लिए.
मेघराज ने भी हमसे,आँखे अपनी अब फेर लिए.
                   माना की बहूत गति दिया है हम ने अविष्कार को.
                   पर आज तरस रहा है आदमी बारिश के फुहार को.
                         काली घटाए, रिमझिम बारिश, हवा संग बिजली का तड़पना.
                         आज की तारीख  में बन के रह गया महज एक कोरी कल्पना.
हम यूँ बदले की बदल गया सब,कुदरत का कानून.
                         लगता है दिल्ली वालों से रूठ गया मानसून.