Sunday, January 15, 2012

ग़ज़ल :हँसने, मुस्कुराने के ओ दिन गुजर गए.



हँसने, मुस्कुराने के ओ दिन गुजर गए.
ओ जूनून,ओ जज्बात सब दिल से उतर गए.
अब रहा नहीं ओ मौसम,न रही चमन की रौनक,
अब तो फूलों की बेरुखी से, भौरे भी डर गए.
चाँद तारों के आँगन में भी,सिमटने लगे उजाले,
सच कहिये तो अंधेरों के भी, किस्मत संवर गए.
अब नहीं रहा वो अपनापन,न रहा ही भाईचारा,
नफरत की तीखी गंध से,सबके दामन भर गए.
समंदर के सफर में, अब ओ सुकून नहीं रहा,
क्योंकि सारे हसीं मंजर, लहरों में बिखर गए
बस याद बनकर रह गए, "अंसारी" गुजरे दिन,
जब से नए ज़माने के रंग पसर गए.

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