Friday, July 22, 2011

"आज का आदमी" ................

दरो-दायरा अपनापन का अब घटता जा रहा हैं.
आज का आदमी खुद में ही सिमटता जा रहा हैं.
अब तो दिखती नहीं कही भी इंसानियत की तस्वीरे.
गला घोंट के वसूलों की बदली जाती है तकदीरें .
कौमी मुल्क जुबा के लहजे पे बटता जा रहा है.
आज का आदमी खुद में ही सिमटता जा रहा हैं.
होंठों के मुस्कुराहट पे अब दिखती है साफ महंगाई.
एहसास करने लगे है लोग अपनों के बिच भी तन्हाई.
रस्मो-रिवाज़ गुजरे ज़माने का, पलटता जा रहा है.
आज का आदमी खुद में ही सिमटता जा रहा हैं.
ऐसा कुछ रहा नहीं ज़माने में, हम करे जिस पे नाज़.
अब तो गूंजती नहीं चमन में भी बुलबुल की आवाज़.
"अंसारी" आईना शर्मो-हया का नजरो से,
हटता जा रहा है.
आज का आदमी खुद में ही सिमटता जा रहा हैं.

शायर :- नूरैन अंसारी

Thursday, July 21, 2011

ग़ज़ल: "ना जाने कितना रंग बदलती है ज़िन्दगी."


ना जाने  कितना रंग बदलती  है  ज़िन्दगी.
सुख-दुःख  को  लिए संग चलती है ज़िन्दगी.
मिले है  कही  इसको  ऐशों-आराम के साए,
टुकड़ों  पे  भी देखा है पलती है ज़िन्दगी.
कही पे सर  छुपायी है दरख्तों के छाव में,
महलों में भी देखा है  टहलती है ज़िन्दगी.
कही पे ओढ़े बैठी है मयुशियों  का चादर,
कही खुशियों के गोद में उछलती है ज़िन्दगी.
फूल इसको अज़ीज़ है, तो कांटे भी हमसफ़र है,
 वक़्त आने पे आग में भी जलती है ज़िन्दगी.
 नहीं है कोई रिश्ता मजहब से इसका यारों,
जिस सांचे में ढाल दो, ढलती है ज़िन्दगी.
                                                                                    

Monday, July 11, 2011

ग़ज़ल : फिर मुझ से रिश्ता तोड़ के तुम चले जाना..................


आंसू बह रहे है इन्हें रुक जाने दो  पलभर.
दर्द की घनी घटाओं को छुप जाने दो पलभर.
         जब रूठे होंठ  शुरू कर दे फिर से मुस्कुराना.
         तब मुझ से रिश्ता तोड़ के तुम चले जाना.
जब मेरे अपने भी लगने लगे पराये.
चुभने लगे जब भीड़ में तन्हाई के साए.
मिट जाए जब मन से अपनापन की दाग.
कहने लगे जब बेवफा मुझको लोग-बाग़.
       जब सरेराह ये दुनियावाले मारे मुझ पर ताना.
       फिर मुझको तनहा छोड़ के तुम चले जाना.
बुझ जाने दो शबनम की ये प्यास अधूरी.
मिट जाने दो धड़कन से धड़कन की दुरी.
हसरत ना रह जाए तेरे बिन कोई बाकी.
पिला दे आँखों से जी भर के जाम मुझे साकी.
       मदहोशी शुरू कर दे जब मेरे तन-मन पे छाना.
       फिर मुझसे मुंह मोड़  के तुम चले जाना.

Saturday, July 2, 2011

कविता : Salary की रासलीला

Salary आती है टेस्ट मैच की तरह और चली जाती है ट्वेंटी-ट्वेंटी की तरह.
फिर पुरे महीने बजती है जिंदगी,किसी उजड़े स्कूल की टूटी घंटी की तरह.
          एक बेचारी Salary उसपे कितने अथाह बोझ.
          बेदर्दी से उसी का USE हम करते है हर रोज.
               हजारों समस्याओं से घिरी Salary खुद को बचाने में असमर्थ है.
--             इसकी समृद्धि के लिए दुआ करना दोस्तों फिलहाल ब्यर्थ है.
       तरस आता है मुझे अपनी Salary पे जो करती है तन-मन से मेरी सेवा.
       और एक हम है जो उसे एक हफ्ते भी सुहागन नहीं रहने देते कर देते है निर्मम बेवा.
              कोसे भी तो किसे कोसे,खुद को, हालात को या उन्हें जिन्होंने salary हमारी बनायीं है.
             कोस नहीं सकते कुपोषण के शिकार अपनी Salary को,जो हजारों बार इज्जत हमारी बचाई है.