Sunday, September 4, 2011

ग़ज़ल : अपनों से भला कोई यूँ नाराज नहीं होता.

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हर कोई हर दिल का हमराज नहीं होता.
सब के सर पे उल्फत का ताज नहीं होता.
मेरी तन्हाई कहती है अब मान भी जाओ,
अपनों से भला कोई यूँ नाराज नहीं होता.
शिकवे-गिले जताते है अपनापन है कितना,
इनके बिना तो प्यार का आगाज नहीं होता.
फासलों में सिमटी है मिलने की मीठी चाहत,
नहीं कोई रूठता,तो मनाने का रिवाज नहीं होता.
"नूरैन" संकोच की सरहदों से निकल जाने दो लब को,
क्योंकि ख़ामोशी से ख़ामोशी का इलाज नहीं होता.

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