Friday, March 28, 2014

ग़ज़ल : तुम से बिछड़ जाने का एहसास बहुत हैं.










दुनिया की हर ख़ुशी मेरे पास बहुत हैं.
आज फिर भी मेरा दिल उदास बहुत हैं.

तन्हाईयां मेरी ये कहती है तड़पकर,
तुम से बिछड़ जाने का एहसास बहुत हैं.

कुछ भी कर लु अकेलापन जाता नहीं
जबकि मेरे आसपास मेरे खास बहुत हैं.

तेरी यादों के सल्तनत पे कोई जोर नहीं मेरा
गुजरे लम्हों के हर तह में इतिहास बहुत हैं.

इश्क करने का जूनून जायज़ हैं मगर
"नूरैन" राहे-मुहब्बत में बनवास बहुत हैं

Thursday, March 27, 2014

ग़ज़ल : किसी के दिल में कहाँ देर तक एहसान रहता हैं


किसी के दिल में कहाँ देर तक एहसान रहता हैं
आज का आदमी तो खुद से ही परेशान रहता हैं

दर्दे दिल लिए लोग घूमते हैं तन्हा सड़को पे,
मरकज दिल्लगी का अर्से से सुनसान रहता हैं

मीनारों से आज भी सदाओं की आवाज आती हैं
खानकाह भले ही फकीरों बिन बिरान रहता हैं

महकते फूलों के रहबर तो मिलते हैं कदम-2 पर
मगर सूखे साखों पे कहाँ किसी का ध्यान रहता हैं

तिजारत की इस दुनिया में,कींमत नही जज्बातों की,
"नूरैन" ख़तरे में हर घड़ी इंसानो का ईमान रहता हैं




Friday, January 17, 2014

कविता :मेरे ओर से आपको very Happy ठण्ड



















पहन लो मोटा स्वेटर और ओढ़ लो रजाई.
येही मौसम का मांग है क्या करोगे भाई.
और नहाना रोज-रोज का कर दो अब बंद.
मेरे ओर से आपको very Happy ठण्ड.

अब तो धुप लागे निक,पानी मारे करेंट.
सुबह जागने वालों का घट गया परसेंट.
ज्यों-ज्यों हो रहा है असर यारों सर्दी का.
रूप निखरता जा रहा है आलस बेदर्दी का.
रफ़्तार जोश-उत्साह का होने लगा है मंद.
मेरे ओर से आपको very Happy ठण्ड.

आग के इर्द-गिर्द अब लगने लगे है मेले.
जगह-जगह दिखने लगे मूंगफली के ठेले.
ठंडी हवा सुबह की ले के आये शीतलहरी.
दुबकने लगे घरों में ग्रामीण हो या शहरी.
गर्म खाने, गर्म कपड़ों से जुड़ने लगा सम्बन्ध.
मेरे ओर से आपको Very Happy ठण्ड.

Thursday, January 16, 2014

ग़ज़ल : न जाने क्यों मुझे वो लोग ही, बर्बाद करते हैं

न जाने क्यों मुझे वो लोग ही, बर्बाद करते हैं 
जिनके खैर-मकदम खातिर हम फरियाद करते हैं 

सदा घर जलता हैं मेरा, घर के चिराग से ही, 
चोट खाते हैं उनसे,जिनपे हम एतमाद करते हैं 

कौन पूछता हैं मुझको,ये बहारों तेरे मौसम में,
हाले-हिज्र में ही लोग मुझे बस याद करते हैं 

जिक्र होती हैं जब भी,महफ़िल में खैरख्वाहो की,
चर्चा मेरी शहादत का ,वो सबके बाद करते हैं 

नफरत अक्सर मेरे दर से नाराज लौट जाती हैं, 
हम मुहब्बत को ही पाल-पोसकर फौलाद करते हैं 

"नूरैन" अपनी किस्मत तो चिरागों के माफ़िक हैं,
हम खुद ही जलकर घर औरों का आबाद करते हैं

Wednesday, January 8, 2014

ग़ज़ल: इस जख्मी सीने पे कई बेरहम नासूर रहते हैं


माना मसरूफियत में बेइंतहा हम चूर रहते हैं
कभी वक़्त तो कभी हालात से मजबूर रहते हैं

फिर भी ढूंढेंगे तो पावोगे अपने दिल के पास ही,
मायने ये नहीं रखता हम कितने दूर रहते हैं

हम खामोश है तो ये नहीं कि जिन्दा नहीं है हम
हमारे दिल में भी अरमानो के कोहिनूर रहते है,

हंसी तो एक बहाना है अपनी तड़प छुपाने का,
इस जख्मी सीने पे कई बेरहम नासूर रहते हैं

इबादत तेरी उल्फ़त का किया हैं हमने सदियों से,
फिर भी तेरी बज्म में हम रूसवा जरूर रहते हैं

"नूरैन" हाले-दिल सुनाने का मुद्दतो से ख्वाहिश हैं
मगर सुना है मुझसे खफा-खफा मेरे हुजूर रहते हैं

Monday, January 6, 2014

ग़ज़ल - दुनिया फिर हमारे सब्र को आजमाना छोड़ देती है


शराफत जब कभी भी अपना पैमाना छोड़ देती है.
दुनिया फिर हमारे सब्र को आजमाना छोड़ देती है.

इस्तेक़बाल बुलंद होता है जहाँ कही भी अमीरी का,
सच्चाई उन दरवाजों पर आना-जाना छोड़ देती हैं .

क़दमों को जब पड़ जाती है बेदर्द ठोकरों की आदत,
मासूम आँखे पथरा के आँसू बहाना छोड़ देती है .

बागे-बहार में बढ़ जाती है जब सय्यादों की आमद,
बुलबुले खौफ से फिर नग़मे सुनाना छोड़ देती हैं .

मुहब्बत इंतेहा की हद तक जब परवान चढ़ती है,
बंदिशे आशिकों को बेवजह तड़पाना छोड़ देती हैं .

सियासत सड़क से जब चलकर,संसद तक पहुँचती हैं 
बेदर्द बनकर आम-आदमी का घराना छोड़ देती है.

Monday, December 23, 2013

ग़ज़ल: आख़िर औरो की तरह तू भी बेवफ़ा निकला












कहाँ किरदार तेरा ज़माने से जुदा निकला
आख़िर औरो की तरह तू भी बेवफ़ा निकला

कश्ती डूब गयी मेरी,साहिल के करीब आके,
तूफां की साजिश में शामिल नाख़ुदा निकला

मुहब्बत बिक गयी ,बाज़ारों में खरीदारों के बीच,
तिज़ारत करने वाला शख्स, मुँह लगा निकला

सजदे हमने किये ताउम्र तुम्हारी खैर-मकदम का,
फिर भी मैदाने-हश्र में मेरे खातिर बददुआ निकला

लफ्ज़ हमदर्दी के बेवा हुए,अपनों के कत्लेआम से,
और वजूद सच का तेरे शहर में गुमशुदा निकला