Thursday, October 16, 2014

प्रस्तुत हैं : मंगलयान की अभूतपूर्व सफलता पे रचित रचना

बिश्व-गुरु बनने का हमने शुरू कर दी अभियान
ये मंगल तेरी पटल पर हम पहुँचे ससम्मान
हमारे इरादे अटूट -अटल
प्रथम प्रयास में हुए सफ़ल
देखती रह गयी दुनिया सारी
गौरवान्वित हुई तकनीक हमारी '
आज कर रहे हैं सब धरा पर भारत की गुणगान
ये मंगल तेरी पटल पर हम पहुँचे ससम्मान
अदभूत क्षमता,अथाह लगन
ISRO तुझको शत-शत नमन
इस उपलब्धि पे सबको है गर्व
हम सब के लिए है राष्ट्र -पर्व
यूँ ही सदैव शिखर पे आसीन हो भारत-माँ के संतान
ये मंगल तेरी पटल पर हम पहुँचे ससम्मान

कबिता :आओ मिलकर सफल बनाये स्वच्छ भारत अभियान

सियासत को मारो गोली
इसने बहुत हैं जहर घोली
छोड़ो अब राजनीति की बात
सोचे सबके हित की बात
ऐसा मिशन चलाये जिस से सबका हो कल्याण
आओ मिलकर सफल बनाये स्वच्छ भारत अभियान
अपना घर मोहल्ला साफ़ करें
प्रकृति संग इंसाफ़ करें
वातावरण ना दूषित हो
नियति न हमसे कलुसित हो
राष्ट्र सेवा में करें समर्पित,कुछ क्षण अपना मूल्यवान
आओ मिलकर सफल बनाये स्वच्छ भारत अभियान
ये सदा प्रयास रहे जिंदगी में
न खुद जिए न जीने दे गन्दगी में
करें इस ब्याधि का समूल अंतिम-संस्कार
ताकि परम आदरणीय बापू का सपना हो साकार
हम विश्व-पटल पर बनकर उभरे एक नया कृतिमान
आओ मिलकर सफल बनाये स्वच्छ भारत अभियान

ग़ज़ल: रिश्ते दिल से जो बने हैं दूर-तलक जायेंगे

शीशे खुदगर्जी के बीच राह चनक जायेंगे 
रिश्ते दिल से जो बने हैं दूर-तलक जायेंगे 

फूलों में मुहब्बत की अगर तासीर बची रही ,
फिर सारे चमन वफ़ा की खुश्बू से महक जायेंगे 

तुम जितना चाहो मुझपे तोहमत लगा लो लेकिन,
जब कभी गौर से सोचोगे तो अश्क़ छलक जायेंगे

तुमसे बिछड़ के भी, यकीन जिन्दा हैं आजतक ,
हम वो नहीं जो औरो की बातों में बहक जायेंगे

सब कुछ छीन लो तुम मुझसे अपनी निस्बत का,
मगर तुझे याद करने के कहाँ मेरे हक़ जायेंगे 

Monday, June 30, 2014

ग़ज़ल :कुछ भी कर लू मेरे चेहरे से, शराफ़त नहीं जाती

लाख मेहनत पे भी,मुफलिसी की हालत नहीं जाती.
कुछ भी कर लू मेरे चेहरे से, शराफ़त नहीं जाती.

जिंदगी जीने के सारे जतन कर लिए हमने लेकिन,
हर महीने, दोस्तों से मॉँगने की आदत नहीं जाती.

झूठ ने मेरे हौसलों को तोड़ने की बहुत कोशिश की,
सच के ख़ातिर फिर भी लड़ने की ताक़त नहीं जाती.

उस से बिछड़े हुए अब तो एक ज़माना हो गया ,
ज़ेहन से आज भी उसके क़दमों की आहट नहीं जाती.

"नूरैन" शहर में में रहते हुए मुझे बरसों हो गए लेकिन,
गावं में जीने की दिल से कभी चाहत नहीं जाती.

ग़ज़ल: शायद उनको मेरी हालात का अंदाज़ा नहीं हैं

वो अक्सर पूछते हैं कुछ नया ताज़ा नहीं हैं
शायद उनको मेरी हालात का अंदाज़ा नहीं हैं

मेरी हँसी से तौल लेते हैं वो मेरे किरदार को,
क्योंकि मेरे ग़म उनसे अबतक साँझा नही हैं

ये ख़ुदा तेरी रहमों पे टिकी हैं मेरी आबरू,
वरना मेरी झोपड़ी में अब तक दरवाज़ा नहीं हैं

जिसे भी मिलता हूँ दर्द लिए आता हैं ज़माने में
मुसीबत की नज़रों में कोई रंक-राजा नहीं हैं

अब तो दूसरों के सुकून में ही सुकूं हैं मेरे दिल का
खुद के लिए जीना अब वसूलों का तक़ाज़ा नहीं हैं

Monday, June 2, 2014

गज़ल : जब से बड़े दरबार में उसका,आना-जाना बढ़ गया है

मेरे साथ वाले मुलाज़िम का, मेहनताना बढ़ गया है.
जब से बड़े दरबार में उसका,आना-जाना बढ़ गया है

किसी की जी हजूरी अपनी, कभी फितरत नहीं रही,
खुद्दारी खून में हैं इसलिए,हमपे निशाना बढ़ गया हैं

कितनो की हसरतें नाकाम होकर, बह गयी समंदर में,
सुना है तूफानी लहरों का अब,माझी से याराना बढ़ गया हैं

ये शहर तुम्हारे खातिर, मैं भुला नहीं हूँ गावं को,
मजबूरी ये है की तेरे आँगन में, कारखाना बढ़ गया हैं

"नूरैन" रंजिशें पहले भी थी,पर दोस्ती रहती थी महफूज
अब तो छोटी सी बात पे भी हमला, कातिलाना बढ़ गया है

Friday, March 28, 2014

ग़ज़ल : तुम से बिछड़ जाने का एहसास बहुत हैं.










दुनिया की हर ख़ुशी मेरे पास बहुत हैं.
आज फिर भी मेरा दिल उदास बहुत हैं.

तन्हाईयां मेरी ये कहती है तड़पकर,
तुम से बिछड़ जाने का एहसास बहुत हैं.

कुछ भी कर लु अकेलापन जाता नहीं
जबकि मेरे आसपास मेरे खास बहुत हैं.

तेरी यादों के सल्तनत पे कोई जोर नहीं मेरा
गुजरे लम्हों के हर तह में इतिहास बहुत हैं.

इश्क करने का जूनून जायज़ हैं मगर
"नूरैन" राहे-मुहब्बत में बनवास बहुत हैं