Monday, May 4, 2015

ग़ज़ल - पूछने पे अगर आये तो सवाल बहूत है


पूछने पे अगर आये तो सवाल बहूत है.
तेरे काले करतूतों की मिशाल बहूत है.

सियासत तूने जबसे गोद ली बेईमानों कों,
तब से मेरी भारत माँ, बदहाल बहूत हैं.

हमारी वोट से तुम नोट का बिस्तर सजाते हो 
हमारी सब्र और तुम्हारे ऐश के 5 साल बहुत हैं 
 
बेबस,मजलूमों की आहों का सौदा करनेवालों,
मजबूर खामोशियों के तह में भूचाल बहूत है
 
रोती है वतन की मिट्टी,बेदर्द रहनुमा निकला,
जम्हूरियत को अपने फैसले पे मलाल बहूत है.

Thursday, April 30, 2015

कविता : कभी थकता नहीं मजदूर (मजदूर दिवस)











हो सकता हैं बेबस-मजबूर !
रह सकता हैं अपनों से दूर !
मगर कभी थकता नहीं मजदूर !!!
मेहनत की परकाष्ठा ही उसके जीवन की मोक्ष हैं !
अतीत,बर्तमान और भविष्य सब उसके परोक्ष हैं !
संघषों की आत्मकथा लिखता हैं अभावों में !
शहर बसा देता हैं किन्तु रहता हैं वो गांवों में !
हो सकता हैं पीड़ा से चूर !
ब्याधि कर सकतीं हैं मजबूर !
मगर कभी थकता नहीं मजदूर !!!
जिसके जीवन-यापन की शैली क्या अद्भुत निराली हैं !
जहाँ थकानों की गोद में बसती,अरबों की खुशहाली हैं !
महलों और चौबारों में तो आहों की भरमार हैं !
टूटी हुई झोपड़ियों में आज भी सच्चा प्यार हैं !
उत्साह से रहता हैं भरपूर !
ईश्वर की कृपा हैं जरूर !
कभी थकता नहीं मजदूर !!!
फनकार : नूरैन अंसारी

Wednesday, February 25, 2015

ग़ज़ल : कितना भी भूले जमाना गुजर जाता हैं











कहाँ आसानी से जख्मे-जिगर जाता हैं !!
कितना भी भूले जमाना गुजर जाता हैं !!
मुहब्बत में हमने पायी हैं वो मक़ाम,
की वफ़ा के नाम से ही दिल डर जाता हैं !!
आ जाती है जब कभी कोई याद पुरानी,
मौजे वक़्त का हर लम्हा ठहर जाता हैं !!
दयारे बज्म में उम्मीदें अब सजती नहीं,
सेहरा सरे रिवायत से पहले उतर जाता हैं !!
हम रकीबों में भी हैं सलामत अभी तक,
हमदर्द चेहरों से रोम-रोम सिहर जाता हैं !!
ये शहर तेरी निस्बत से फारिग हैं हम
कहाँ रूह से कभी गावँ का असर जाता हैं !!

मुहब्बत तू सच में खूबसूरत बहुत हैं


मुहब्बत तू सच में खूबसूरत बहुत हैं 
आज दिलों में तेरी जरूरत बहुत हैं 

तू ना हो तो रिश्तों में फासले बढ़ जाते हैं 
नफरत करने वालों के हौसले बढ़ जाते हैं 

हर फर्क मिटा देती हैं तूं अपने और पराये में 
कितना सुन्दर लगता हैं जीवन आकर तेरे साये में 

यूँ तो जिंदगी जीने के सूरत बहुत हैं 
मुहब्बत तू सच में खूबसूरत बहुत हैं 

हसरत मेरी हैं की तू बयाँ हो हर जुबा से 
तेरी खैर-मकदम की दुआ करते हैं खुदा से 

तेरे पसमंजर में मिट जाये हर फर्क-हर दुरी
तेरे करम  से टूटी उम्मीदें बन जाए सिंदूरी 

इज़हार करने के ज़माने में मुहूरत बहुत हैं 
मुहब्बत तू सच में खूबसूरत बहुत हैं 

Tuesday, December 16, 2014

कविता : काश ! ईश्वर का कुछ ऐसा माया हो जाता

काश ! ईश्वर का कुछ ऐसा माया हो जाता 
देश के सारे भ्रष्ट नेताओ का सफाया हो जाता

फ़िर बेबस लाचार जनता को मिल जाती चिर सुकून
कोई जनहित के नाम पे न पीता गरीबों का खून 
             थम जाता सिलसिला बेशुमार घोटालों का 
             और रूह तृप्त हो जाती वतन पे मरने वालों का
नि:संदेह,भारतभूमि का कल्प काया हो जाता 
काश ! ईश्वर का कुछ ऐसा माया हो जाता

कसम से लिखे अगर हकीकत इनकी बेहयाई का 
दोस्तों कम बहूत पड़ जायेगा समंदर रौशनाई का 
                  संसद के सोफों से ये करते है बदहाल गावों की निगरानी 
                  इनकी निष्ठुर निर्मम आँखों से सुख चूका है सारा पानी

बरसों से छलती आस्था का,भरपाया हो जाता 
काश ! ईश्वर का कुछ ऐसा माया हो जाता

Monday, December 15, 2014

ग़ज़ल : कुछ भी कर लू मेरे दर से बदहाली नहीं जाती















मेरे दुश्मनो की बददुआ अब खाली नहीं जाती !!
कुछ भी कर लू मेरे दर से बदहाली नहीं जाती !!

लाख हंसने की कोशिश मैं भी करता हूँ लेकिन,
मेरे चेहरे से उदाशियों की रखवाली नहीं जाती !!

ये नादाँ  दिल मत उम्मीदों की अम्बार तू बढ़ा,
दौरे नाकामी में ये बोझ संभाली नहीं जाती !!

कौन चाहता हैं दुनिया में रंजो-गम में रहना,
मगर कुछ मुसीबतें चाहकर भी टाली नहीं जाती !!

तोहमत औरों पे लगाना कहा तक हैं मुनासिब, 
ताउम्र अपनी ही जमीर खंगाली नहीं जाती  !!

Thursday, November 20, 2014

ग़ज़ल : वक़्त के साथ रिश्तों के मायने बदल जाते हैं













 वक़्त के साथ रिश्तों के मायने बदल जाते हैं
आईना वही रहता हैं सिर्फ चेहरे बदल जाते हैं

मजहबे मतलब की इबादत करती हैं ये दुनिया
देखा है आड़े वक़्त पे सारे अपने बदल जाते हैं

मुंसिब इन्साफ का हवाला देता हैं अदालत में
मगर जब बात अपनों की हो क़ायदे बदल जाते हैं

सियासत सड़को तक ही लोगों का दर्द समझती हैं
तख़्त मिलते ही नेताओं के मनसूबे बदल जाते हैं

"नूरैन" सीने में बची हो गर मिलने की ख़्वाहिश,
बड़े अदब से नजदीकियों में फासले बदल जाते हैं